First Posted online on May 19th 2015

कुछ यादें भूलती नहीं । बरक़रार रहती हैं, और तड़के सुबह आँखों में आकर जगा देती हैं । आज सुबह भी यही हुआ । आखों के सामने वही चित्र घूमा । गर्मी की एक अलसाई शाम, ढलता हुआ सूरज, बरामदे में जमती हुई धूल और वातावरण में बिखरे कण । बरामदे की मुंडेर पर कोहनी के बल खड़े हर आते जाते व्यक्ति को देखना । समय बीतने पर बेचैनी, पर कान शायद पीछे गराज के ताले पर थे । ताला खुलने की जानी पहचानी आवाज़, नसों को शांत कर देती है । मिंटो में वे दोनों कन्धों पर झोला लटकाये सामने की सीढ़ी से चढ़ते हुए ऊपर आकर घंटी बजाते है । पापा घर आते हैं ।