लपक-झपक तारीख बदल गयी, आया और नया इक साल,
चुनमुन, मुनमुन, बल्लो, बबलू, नए साल में करें धमाल
एक उत्साह, उमंग है सब में, संकल्पों की सूची संग,
पर महंगाई, इन्फ्लेशन, नेता, उत्सुक करने को रंग में भंग

लपक-झपक तेरह से चौदह, फ़र्क़ क्या पड़ता मनमोहन को,
कल चुप थे, आज भी चुप हैं… बोलें कुछ, मैडम करें सवाल
ओबामा का तो साल बुरा था, हेल्थकेयर ने किया बवाल,
लोग खुश नहीं, मिशैल भी घूरें, आस लगाये अबकी साल

लपक-झपक सच का कितना… साथ निभाते ‘आप’ केजरीवाल,
जे. पी. भी कभी चले इसी रस्ते, पर अनुयायी बनाते माल
‘आप’ के नेता, ‘आप’ के मंत्री, ‘दिल्ली में होंगे अबकी साल,
डूबें, उतरें, अवसाद करें… जनता जैसी थी.… वैसी बेहाल

लपक-झपक पूछा नेताजी ने, भूख, गरीबी का क्या है हाल?
वोटों को गिनने के दिन हैं, पहनो खादी लगाओ चौपाल
नुक्कड़ की बुढ़िया ने पूछा, नेताजी क्या हो रहा कमाल?
भूख जो कल थी, आज भी है, नहीं मिले खाने को पूआ माल

‘लपक-झपक’… या ‘लप-झप’ कर के… बीतेंगे कितने ही साल,
जिनके पार गए हम… अच्छे, न बीते तो… रूक गया काल
गया बरस निर्भया बिन बीता… के निर्भय हों, अब आगे साल,
अच्छा बीते बरस यह ख्वाहिश.… स्वस्थ, आशीर्वाद संग और खुशहाल

— विवेक शुक्ल
१ जनवरी २०१४