First posted online on October 14th 2014

शायद मैं जानता हूँ तुम्हें

तुम… एक बेफिक्री सी पहचान,

एक उन्मुक्त सोच,

एक ठहराव, एक गहरा जुड़ाव,

आपसी सोच का खिंचाव

सोचता हूँ…

सोचता हूँ के जानता हूँ तुम्हें,

शायद नहीं…. पर खुश हूँ,

उस ठहराव, जुडाव और खिंचाव से

जिसने तमन्ना दी है ज़िन्दगी की, मिलन की, आस की

उस आस की, जो ला सके करीब,

वे आँसू, वह दर्द, वह करीबी जज़्बा,

जानता हूँ तुम्हें शायद, या नहीं,

लेकिन इंतज़ार है, मिलन का वह पल,

वह पल, जो मेरा आखरी ही क्यों न हो