बचपन से हमें मालूम था संगीत का हमारे मन पर असर ।पापा सुबह-सुबह रेडियो लगा देते थे और पांच मिनट के संस्कृत समाचार के ‘इति वार्ताः’ के बाद भजनों का सिलसिला शुरू होता था। ग्रामाफोन पर बड़े गुलाम अली, और Come September के LP सुन-सुन कर बड़े हुए।

अम्मा बताती हैं उनकी शादी में बाबा के दोस्त ,उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब ने शहनाई बजाई थी, और साल भर की उम्र में हमने तुलसी थिएटर में पंडित रविशंकर का सितार बिना हल्ला-गुल्ला किये पूरी रात सुना था ।और फिर १२-१३ साल की उम्र में जगजीत सिंह हमारी पहली मुहब्बत बन गये ।कुछ साल पहले हमने एक दोस्त से कहा था, “जब हम जाने लगें तो जगजीत सिंह की ग़ज़लें बजा देना, तो शायद हम कुछ देर और रुक जायें”।

२०१९ नवम्बर में लखनऊ से लौटने के बाद हमने “कारवाँ ” खरीदा और पापा के समान सुबह-सुबह कारवाँ पर संगीत बजने लगा ।अमीन सायानी जी का ‘गीतमाला की छाँव से’ कार्यक्रम १९५२ के गीतमाला से आखिर तक सुना । कई बार सुना ।वो पापा से थोड़ा बड़े हैं, तो उन तक पहुँचने का मन किया । email ढूंढ कर मन की बात लिख दी और सोचा शायद जवाब दें । हम लिखकर भूल गये और एक साल बीत गया ।मन बुझ सा गया यह पढ़कर की उनकी तबियत ख़राब चल रही है ।फिर अभी कुछ दिन पहले अमीन सायानी जी का email आया ।पढ़कर बचपन से अब तक बहुत सी यादें उमड़-घुमड़ कर हमारे सामने आईं । बहुत रोये भी ।

रॉयल अल्बर्ट हॉल, लंदन कोलिसियम, क्रेसगी ऑडिटोरियम, बर्कली ऑडिटोरियम में बहुत बार संगीत सुना , लेकिन जो सुकून ‘पिया तोसे नैना लागे रे’, ‘आयगे, आयेगा आनेवाला ‘ सुनकर मिलता है वो बयां करना मुश्किल है ।एक साल पहले की बात है, किसी बात से मन खिन्न था ।पूरा दिन निकल गया, किसी ने कारवां चला दिया, और उसपर ‘न तो कारवां की तलाश है, न तो हमसफ़र की तलाश है, मेरे शौकेखाना ख़राब को, तेरी रहगुज़र की तलाश है’ बजने लगा ।मन प्रसन्न, और हम झूम उठे, जैसे १ कप चाय और १ एस्पिरिन के बाद सर दर्द काफूर हो जाता है ।हमने सोचा हमें भी तो संगीत, तेरी रहगुज़र की तलाश है ।