First Posted online on September 25th 2015

“विवेक, RIP… ईश्वर आपकी आत्मा को शांति दे विवेक”, “RIP Vivek”

किसी के जाने के बाद यह जो अमूमन लोग RIP पोस्ट करते हैं, वो सामाजिक प्रथा ही होगी | दूसरों के लिए ही होगा | क्योंकि जो चला गया वो तो पढ़ने से रहा | कितनी बार हमने देखा किसी के जाने के बाद लोगों को भावुक प्रेम उदगार ज़ाहिर करते | पढ़कर मन गद-गद हुआ ढेर सारे लोगों का प्रेम देखकर | यह भी सोचा, जैसा अभी ढेरों RIPs और गुणगान कर रहे हैं अगर वैसा सबने इकठ्ठे उसके रहते उससे कहा होता तो शायद वह और जी जाता | सबका प्रेम उदगार देखकर दिल खुश होगा, मन में सुकून होगा तो ज़ाहिर सी बात है आत्मा भी होगी |

बचपन में इंटरनेट, सोशल मीडिया नहीं था | परिवार व्रिस्तृत होते थे और सामाजिक दायरा भी भौगोलिक था | चिट्ठी से और फिर बाद में फ़ोन पर अच्छे, बुरे समाचार मिलते थे | तार आना वाकई भयावह होता था और कई बार ग़मी का समाचार लाता था | एक समय था जब किसी व्यक्ति, परिवार के लिए वेदना, संवेदना का एक अंतराल होता था जो कुछ दिनों या समय तक चलता था | कभी हम खुद, कभी परिस्थियाँ दुखों को लम्बा रखती थीं |

आज सोशल मीडिया से अच्छी-बुरी खबरें तुरंत मिलती हैं और ग़मी तात्कालिक सूचनाएं बन कर रह गयीं हैं | आपने कुछ समय की देर की तो Facebook पर चर्चा और पृष्ठ बदल गया |

RIPs का ज़माना है जिसकी प्रथा भी निराली है | सोशल मीडिया पर एक ही बैठक में शुक्ला जी के जाने का अफ़सोस, सिंह साहब के प्रमोशन की बधाई, नैय्यर की बीजिंग यात्रा के चित्रों पर ‘nice pic’ का लेबल और पेट से आंत जुड़े गरीब भूखे बच्चे की कहानी का share | चाय के केवल एक प्याले के साथ यह सब सामाजिक ज़िम्मेदारी उतारने का सुख और कहाँ मिलेगा |

यह जो अमूमन लोग RIP पोस्ट करते हैं किसी के जाने के बाद, वह जीवित बचे बंधू-बाँधवों के बीच सामाजिक प्रथा ही होगी | विवेक तो गये ,अब पढ़ने से रहे| और उसकी आत्मा कितने आराम से है, वह यह लौट कर क्या ख़ाक बतायेगा? और क्यों बताएगा भला अगर उस दुनिया में वह यहाँ से अधिक खुश है? खुद ही जा कर देख लो !!!

हमसे किसी ने आज तक RIP न कहा | एक मित्र से जिक्र किया तो बोले, “जा के देखो | इतना तो कर ही सकते हैं सब | पक्का वादा RIP तो मिलेंगे|

कुछ वर्ष पहले Carl Sagan की किताब Contact पढ़ी जिसमें, बचपन में गुज़रे पिता से एक space scientist बेटी संपर्क करना चाहती है, और उसे लगता है उसके पिता कहीं हैं अंतरिक्ष में या मन में | वह सोचती है शायद वहाँ जाया जा सकता है | आज तक तो सशरीर कोई नहीं गया, या आया | और हमारे पास कोई सुझाव भी नहीं | बेहतर है राजनीति, महँगाई, ९९ के फेर पर और जब तक शरीर, मन में दर्द होता है, इलाज़ की चर्चा की जाये | भई आत्मा का पता नहीं, हमारे पास है या नहीं, पर हम सोचते हैं, कि व्यक्ति का सब के बीच से ग़ायब हो जाना अतभुत है |

आश्चर्य क्यों नहीं होता हमें, उस चरित्र के ग़ायब होने पर?

शायद इसलिए क्योंकि वह चरित्र शरीर से जुड़ा था जो रहा ही नहीं | स्वीकारते हैं हम सब, पर प्रश्न नहीं करते |

धरातल पर देखें तो कुछ भी नहीं बदला | क्या फर्क पड़ता है, उस तारिख के FB पन्नों में दबे एक सौ इक्यावन RIPs से | या फिर साल में बरसी पर दस मिनट के फ़ोन से | टीस की कोई भाषा, कोई emoticon, कोई अभिव्यक्ति सटीक नहीं है …क्योंकि आत्मा की पीड़ा केवल इंसान के चेहरे पर ही दिखती है | उस एक के अलावा और किसी को फर्क नहीं पड़ता | वह माँ हो सकती है, बेटी, बेटा भी…जिसे केवल उसका साथ प्यारा था जो चला गया |

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मौत तू एक कविता है,

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे

ज़र्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुचे

दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब

ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन

जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ

मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको

गुलज़ार — “आनंद”

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गुलज़ार साहब ने तो लिख दिया, और क्या खूब लिखा, मृत्यु के साथ कविता के वादे का | लेकिन RIP की बौछारों का ज़िक्र न किया, जो मित्र, करीबी पल भर में देंगे | और ढेरों देंगे |पर हमें तो अभी चाहिए शांति से रहना जहाँ हम हैं । जब तक हम हैं 🙂 इसलिए “RIP विवेक”